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नादानी-ए-इश्क़ - अनहद की कलम से

नादानी-ए-इश्क़

तुझे नहीं था इल्म ज़रा भी,
वो तेरी शैदाई,
तूने उसका इश्क गँवाया,
तू समझा हरजाई।

उसका इठलाना था तुझसे,
इतरा कर शरमाई;
तुझे लगा वो फ़िदा
हर इक पर, तू पागल सौदाई।

तेरी तसवीरों को उसने,
जिगर छीलकर रखा,
बला सुंदरी, शाह-पठाना,
कर गई हक्का-बक्का।

जो भी आया, हुआ जिगर के
जखम देख भौचक्का,
बदनसीब तू फूटी किस्मत,
स्वाद इश्क ना चक्खा।

तूने अपनी नादानी से
क्या गुनाह कर डाला,
तूने अपनी नादानी से
हुकुम खुदा का टाला।

ख्वाहिश तेरी हुस्न, नज़ाकत--
भरा इश्क का हाला,
ना-फ़रेब को धोखा समझा,
लिए हलाहल प्याला।

एक बार जिसको रकीब समझा,
तू उससे कहता,
एक बार तो तू गुरूर के
गुंबद तोड़ उतरता।

एक बार तो नज़र, जिगर के
भीतर देख निहरता,
एक बार तो उसकी रोती
आँखें देख पिघलता!

अब तो तेरी उम्र बीतनी है
उसकी यादो में,
कितने मिसरे, कितनी गज़ले,
यादों की बाहों में।

तन्हाई तेरी सिमटेगी,
हालों और प्यालों में,
कितने मंज़र, कितने मसले,
घूम-घूम ख्यालों में।

तुझे नहीं था इल्म ज़रा भी
वो तेरी शैदाई,
तूने उसका इश्क गँवाया,
तू समझा हरजाई।

२५०२२०/२५०२२०