एक मित्र ने लिखा
"यूँ ही सोच रहा था...
खास बात ये नहीं कि
नाटक करने वाला थक नहीं रहा;
बड़ा आश्चर्य तो ये है कि
देखने वाले अभी तक ऊबा नहीं है!"
मेरा प्रत्युत्तर
Ⅰ.
नाटक में सम्मोहन इतना,
पात्र नाट्य के सच लगते हैं;
फिर बोलो क्यूँ ऊब रहे जो, कथा,
काल अपने लगते हैं!
Ⅱ.
मन को रोज़ नया मसाला,
मिलता हो तो हू-ला-ला-ला...!
किस को फ़िकर वही भाजी है,
हर तड़के का स्वाद निराला!
Ⅲ.
ब्रेकिंग न्यूज 'ब्रेक कर देती,
सब जन की आती जमुआई,
आठ बजे जो बाबा आए,
करी घोषणा नींद भगाई!
कलाकार भी इसीलिये, न
थकता है ना ऊब हमारी,
मन को रोज़ नया रस मिलता,
जनता बुद्धूराम बेचारी !
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