नानू, नर्मदा और नवकक्ष-
नवीन-सी मित्रता, दो पुरातन से परिचितों की!
सब नया-
नए परिपक्व, प्रेमपूर्ण नानू,
नई निरत माँ नर्मदा,
और नए परिवेश में सुसज्जित नया कक्ष…!
इस नवीनता में हमने अपने प्रेम और श्रद्धा के
नए शिखर को छुआ और उस शिखर में रहकर
अपने नवजीवन को भरपूर जिया!
निरत सत्संग, सतत मंथन,
सलिल-सी प्रेममय धारा,
काव्य से ज्ञान का झरना,
तुम्हारा प्रेम स्वीकारा।
अहर्निश सत्य निधिध्यासन,
कर्मरत योग की शाला,
पाक के पाठ का अध्ययन,
शुद्ध उपयोग की शाला।
प्रेम के अनगिने अनुभव,
वासना-मोह का हाला,
आग में तप्त हो निकले,
होश का मिल गया प्याला।
नर्मदा जी की धारा में,
डुबोकर देह को अपनी,
वरतते काल में जीकर,
भविष्यातीत धो डाला।
दर्द का क्षरण करने को,
चित्त को शुद्ध करने को,
रेकी-दोलन समन्वय से,
रोग उपचार कर डाला।
तुम्हें ‘गितेन’ का वंदन,
नमन ‘सुहास’ के अर्पण,
आपने ओ मेरे ‘नानू’,
मुझे नि:शब्द कर डाला!
२५०३०६/२५०३०६





