ये सत्य नहीं साकार हो रहा,
प्रभु तब तक मैं डोल रहा;
ये समझूँ पर वो भी मानूू,
ना पकड़ूँ, ना छोड़ रहा।
चलता हूँ इक राह पकड़, फिर
किस पगडंडी खिंच जाऊँ,
तिरछी आँखे राह तक रहूँ,
पगडंडी पर गिर जाऊँ।
आँखे धुँधली या राहों पर
अंधियारा ही छा जाता,
छड़ी हाथ से छूट पड़ी,
मैं पत्थर-गड्ढे गिर जाता।
टिम-टिम करती कोई रोशनी,
राह बताने फिर आती,
तन की धूल झाड़ता उठता,
तब तक वो गुम हो जाती।
पगडंडी या राह सही है,
द्वन्द्व यही चलता जाता,
पर ज़रूर विश्वास की नज़रे,
लेकर मैं बढ़ता जाता।
तेरे चलने की आहट जो
मेरे कानों आन पड़ी,
नहीं छोड़ सकता मैं बढ़ना,
दिन रहता या रात चढ़ी।
प्रभु मेरी सामर्थ्य बढ़ा,
आहट ये हर-पल सुन पाऊँ,
तेरी इस निर्ध्वनि की ध्वनि को
भीतर-भीतर गुन पाऊँ।
मेरी ऐसी पकड़-छोड़ की
रस्सी तू ही कटवा दे
दो आँखे जो करें उपद्रव,
भीतर आँखे खुलवा दे।
ये सत्य नहीं साकार हो रहा,
प्रभु तब तक मैं बोल रहा,
राह चलूँ या मैं पगडंडी,
मैं तुझ में ही डोल रहा।
१९११२१/१९११२१





