suhas_giten
WhatsApp Image 2025-07-08 at 21.29.45
एक अजन्मे को पत्र
IMG-20250705-WA0011
IMG-20250705-WA0018
IMG-20250705-WA0015
IMG-20250705-WA0013
previous arrowprevious arrow
next arrownext arrow
निशा-सार - अनहद की कलम से

निशा-सार

डरता है वो, रात भयानक लगती उसको,
मैं कहता कि रात बिना विश्राम नहीं है। 
घुप्प अंधेरा छाया, बोला, “कितना बोझिल!”
बोल रहा मैं “ज्योति का निर्माण यहीं है।“

“उगते सूरज पर धरती क्यूँ ना रुक जाती?”
कहता, “तब ये रात कभी ना फिर आ पाती,
डरता नहीं और दिन भर मैं सुख से रहता,
है सबका ये अन्त, यहाँ उत्थान नहीं है।”

“रात आ गई देर को थोड़ी हम सो जाते,
दिन रहने पर क्या सुन्दर सपने आ पाते!
जिन सपनों को मैं दिन में पूरा करता हूँ,
निशा-गर्भ से निकलें, ये निस्सार नहीं है।”

“नहीं रात से डरते, तुम दीपक सुलगाते,
क्यूँ मुझको हो छलते और खुद भी छल जाते?
अन्धकार ये मुझको तो दु:खसम लगता है।
और कहीं ना होगा, वो पाताल यहीं है।”

“चलों मानते हैं, रजनी दुखसम होती है,
पर सुख-दु:ख तो केवल अनुभूति होती है!
संघर्षों में सुख की अनुभूति पा लेता,
दिवा समय का बस केवल सम्मान वहीं है।”

“'कष्टों में सुख' कैसी उल्टी बात कर रहे,
बिना तर्क के मुझसे तुम विवाद कर रहे;
सबको अपने अन्धकार से ये डस लेती,
कौन रात्रि का साथी, भय आक्रांत नहीं है?”

“क्यूँ इतना तुम अन्धकार से भय खाते हो?
अपनी आँखो के खुलने से डरपाते हो,
राजमहल का क्या राजा से अधिक मान है,
तारों का दरबार, चंद्र सम्राट यहीं है।

“ना कहता मैं सदा विभावरी ही रहती,
किन्तु रात्रि के बिना सृष्टि, सृष्टि ना रहती,
इसको तुम जैसे भी जीना चाहो जी लो,
प्रकृति का तो यही चक्र, सिद्धांत यही है।”

“सच कहते हो मित्र, बात अब तर्कपूर्ण है,
रात बिना ये जीवन तो सचमुच अपूर्ण है;
कोई वेदना नहीं वरन् अब सुख ही सुख है, 
है सबका प्रारम्भ और उत्थान यहीं है।”

९१०७३०/९१०७३०

Leave a Comment