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पर हम रीते... - अनहद की कलम से

पर हम रीते…

फिर दिन बीता,
फिर रात गई,
कल सुबह हुई
और कल बीता।
कल का फिर अगला कल बीता।

फिर माह गए,
फिर बरस गए,
फिर दशक-शतों का युग बीता,
फिर युग बीते…
पर हम रीते।

०५०८१७/०५०८१७