suhas_giten
WhatsApp Image 2025-07-08 at 21.29.45
previous arrowprevious arrow
next arrownext arrow
प्रभु! तुम बूँद-बूँद रिसते-से हो - अनहद की कलम से

प्रभु! तुम बूँद-बूँद रिसते-से हो

प्रभु! तुम बूँद-बूँद रिसते-से हो बस
मेरे भीतर।

तुम बाहर तो हो इतने विराट,
इतने विस्तृत-
और मैं खुला हूँ और खाली भी।
यही मान मैं पुकारता हूँ तुम्हे,
इस आस में कि तुम आओगे,
एक तेज बहाव के साथ
और बस,
फैल जाओगे
मेरे संपूर्ण अस्तित्व में।

किंतु प्रभु !
तुम बूँद-बूँद, रिसते-से हो बस
मेरे भीतर।

क्या कोई विशाल शिला
बन गई है राह में अवरोध?
या कि तुम्हारे तीव्र बहाव को
सह पाने की मुझमें
सामर्थ्य ही नहीं?

क्या, करना है मुझको कुछ प्रयास?
या करते हो तुम कुछ उपक्रम
उस शिला को हटाने या
मेरी सामर्थ्य को बढ़ाने का?

किंतु अभी तो…
प्रभु! तुम बूँद-बूँद रिसते-से हो बस
मेरे भीतर!!

१८१००९/१८१००९