और प्रज्ञा जग उठी और बोलती-
"एक प्रतिवासी का घर है,
एक घर खुद का यहाँ,
एक घर परमात्मा का,
बस यही ब्रह्मांड है!"
"तुमने प्रतिवासी के घर को,
खुद का घर समझा हुआ है।
"भ्रांति तुमको बस यही है,
इसको तुमको तोड़ना है,
उसके घर से खुद के घर की ओर,
मुख को मोड़ना है।”
"ओ' सुहास सुन ले ज़रा,
ये बात मेरी जान ले-
"जिस खुशी, आनंद की तू
खोज में भटका रहा,
वो भी जन्मों से तेरे
दीदार को तरसा रहा!"
"मैं तुझे बतला रही
इन राज़ लहरों का ज़रा-
"ना ही इन मौजों से लड़ तू,
ना ही इनमें मौज ले,
ये तो सागर की सतह पर,
खेल पिछली रात का!"
"और सुन तू सच ज़रा
हर इक लहर का-
"ये पुराने हैं थपेड़े,
जिन पे तू खिंचता चला है,
ये कभी तुझको भिगोएँ,
या पटक देगें ज़मी पर!"
"भोगने को भीगने का लोभ...
तू क्या-क्या छोड़ता?!
"अनगिनत सागर का सुख
जो शाश्वत बरता हुआ है,
वो तेरे घर से बड़ा
लज्जित-सा तुझको देखता है!"
"और उस लंबी लहर से
मोह करता डूबता तू!
"शांति की लहरें सदा जो
नाद-अनहद नृत्य करतीं;
देखतीं तुझको बड़ी बेबस,
बड़ी तरसी नज़र से!"
"और सीपें, और मोती,
और रत्नों को सजाता।
"घर तेरा रत्नाकरों का इंद्र-
क्या ऐश्वर्य उसका!
कंकड़ों, पत्थर में तू उलझा हुआ-
क्या भोगता है!!"
तू विषय विष-चक्र में ना घूम,
ये आवाज़ सुन-
"मैं तेरे घर के हर इक कोने से
वाकिफ़ कह रही,
मैं तुझे तेरे ही घर
पलकें बिछाए कह रही,
मैं तुझे करुणा के स्वर में
कर निवेदन कह रही-
“भूल जा तू उस लहर,
सागर औ' उसकी मौज को।
भूल जा तू सीप, मोती, रत्न,
उसकी खोज को।
भूल जो तू भीगने के सुख-
असत को भूल जा,
देख तेरे इस मकां को,
घर बनाने कह रही!
लौट आ वापस
जो रस्ता छोड़ आया था कभी,
था बड़ा अनजान,
अंधा मोड़ आया था कभी!"
अब तो प्रज्ञा की किरण
आवाज तुझ तक आ गई,
और दादा की कृपा
तुझ पर बरस कर छा गई!"
अब तो कुछ देरी नहीं,
दूरी नहीं तू लौट आ,
प्रगट दादा की
असीम जयकार करता लौट आ!"
"तू यहाँ आजा,
तुझे दिखलाऊँगी इक और घर,
परम आत्मा से जहाँ,
मिलती हो ऐसी इक डगर,
सत-चित्-आनंद की जो
व्याख्या फलीभूत हो,
जन्म-मृत्यु चक्र से हो
मुक्त ऐसा इक नगर!”
और प्रज्ञा खिल उठी
और बोलती, "तू लौट आ!"
जग उठा 'सुहास' प्रज्ञा से कहे
आँखों को भर,
"थाम लो अंगुली मेंरी और
ले चलो मेरे ही घर!"
२४०९०९/२४०९०९





