और बातों की छुअन को,
दूर से महसूस कर हम,
तर-बसर होते रहे!
शब्द की हर इक झनक,
अनुनाद करती धड़कनों से,
कम्पनों से युक्त जिंह्वा लड़खड़ाती;
और फिर कुछ शोर यूँ ही
गूँजता हृद-धमनियों में,
मन-पटल की स्मृति कुछ खल-बलाती।
और पहले शब्द ही को
आज तक हिय में बसा हम
स्वप्न में बोते रहे!
और बातों की छुअन को,
दूर से महसूस कर हम,
तर-बतर होते रहे!
नेत्र की हर-इक अलक
विश्राम करती-सी नयन पे,
दृष्टियाँ कुछ देर रुक कर बैठ जातीं;
यक-ब-यक आँखो के
चाहे से मिलन से,
देर तक आँखों की पुतली भी लजातीं।
और इस पहली नज़र को
आज भी मन में निरख हम
हर पहर खोते रहे।
और बातों की छुअन को,
दूर से महसूस कर हम,
तर-बतर होते रहे!
९६११ XX/९६११ XX





