एक- प्रेम
फूलों ने सुर रागिनी छेड़ी,
वीणा ने गंध महकाई,
प्रीत में रोशन मन ऐसा,
अमावस में चाँदनी भर आई!
१७१००९
दो- दिशा, दृष्टि की
असंभव है सत्य को पाना,
दृष्टि बाहर को हो जब तक-
बंद करने होंगे नेत्र दोनों,
तब ही खुल पाएगा तीसरा शिव-नेत्र!
२६१००९
एक- प्रेम
फूलों ने सुर रागिनी छेड़ी,
वीणा ने गंध महकाई,
प्रीत में रोशन मन ऐसा,
अमावस में चाँदनी भर आई!
१७१००९
दो- दिशा, दृष्टि की
असंभव है सत्य को पाना,
दृष्टि बाहर को हो जब तक-
बंद करने होंगे नेत्र दोनों,
तब ही खुल पाएगा तीसरा शिव-नेत्र!
२६१००९