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एक अजन्मे को पत्र
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प्रेमाश्रु - अनहद की कलम से

प्रेमाश्रु

मैं रोया-
और बिखरे ढेर-से आँसू,
-उस रोने से!
उसने समेट लिए वह आँसू,
पवित्र मोती-से!

वो रोई-
और बिखरा ढेर-सा प्रेम
-उस रोने से!
उसने समेट लिया वह प्रेम,
पवित्र धागे-सा!

हम मिले-
और बन गई एक पवित्र माला,
उन मोतियों को पवित्र धागे में पिरोने से,
हमने पहन ली वह माला-
प्रेमाश्रु की!

मैं रोया-
और बिखरे ढेर-से आँसू,
-उस रोने से!
उसने समेट लिए वह आँसू,
पवित्र जल-से!

वो रोई-
और बिखरा ढेर-सा प्रेम
-उस रोने से!
उसने समेट लिया वह प्रेम,
पवित्र माटी-सा!

हम मिले-
और बन गया एक पवित्र आँगन,
उस जल को पवित्र माटी में मिलाने से,
हमने सजाया वो पवित्र आँगन,
प्रेमाश्रु का!

२५०११०/२५०११०