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पुनर्मिलन - अनहद की कलम से

पुनर्मिलन

पुराने घाव को उकेरने से पहले,
हम बहुत वक़्त चुप रहे...
फिर बहुत देर एक-दूसरे के सामने बैठे
हम बात करते...
मौसम की, तबीयत की।

बहुत वक्त
हम ऐसा कुछ नहीं बोले
कि घाव को
तनिक भर-भी संदेह हो पाता
कि हम उसे बस कुछ ही देर में
उकेर देंगे...!
सच तो ये है
कि हमें खुद नहीं मालूम था
कि हम उसे कब छुएंगे!

घाव को हम किस कोने से छेड़े,
इसी उहापोह में हम
वक़्त बिता रहे थे...।
आखिर व्यग्र हो अपनी आँख बंद कर,
पहली अंगुली के नाखूनी कोने से
मैंने घाव को नंगा कर दिया।

घाव ठीक करने की
यह निश्चित प्रकिया है-
रुई का फोहा, पानी और मलहम...।

हम धीरे-धीरे वो सब कर रहे थे
कि जिससे घाव को
सिर्फ एक
निशान पर लाकर ख़त्म कर दें।
वक़्त के साथ जब ज़ख्म मिटने की
उम्मीद ख़त्म हो चली हो,
तो ये ही तरीका रहता है
उसे नासूर बनने से रोकने का।

पट्टी के ठीक बाद,
मुझे दर्द था हल्का-
ज़ख्म उकेरने का,
और राहत थी उस मलहम से
जो हमने लगाया था,
उसे उकेरने के बाद।

९४०३२६/९४०३२६