ये अकेलापन नहीं।
एकांत में मैं बैठकर,
तुमसे गुफ़्तगू करूँ!
बह रहे तुम याँ से वाँ तक,
और मैं बस, 'मैं' कहाँ?
तुममें घुलता, 'तुम' कहाँ?
पर कहीं फिर भी है दूरी...!
"धीर धरो।"
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ये मदिरा मैं पीता जाता
पर रीत-रीत फिर भी जाता,
ये सागर, मैं इस सागर में,
सागर मुझमें भरता जाता,
पर रह जाता
प्यासा...
प्यासा ही रह जाता।
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तुम पूरा मुझे सराबोर करते हो,
उस झंकार से मुझे
पूरा उद्वेलित करते हो,
पर फिर, यूँ मुझे छोड़...
क्यों चले जाते हो?!
प्रभु क्यों...!
१८०९१२/१८०९१२





