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एक अजन्मे को पत्र
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रेत पर लकीरें - अनहद की कलम से

रेत पर लकीरें

तुम जानते हो गम की लकीरों को 
रेत पर खींचना,
पर भूल भी जाते हो इसे
इतनी बेदर्दी से !
तुमने पारंगत की है ये कला,
सहेज कर कैसे रखें इन लकीरों को।

"मानव तू 'मन' में छुप
‘नव' को भूल गया है"
इतना भर याद आना है तुझे...!

०९०२१८/०९०२१८