जीवन के बड़े गूढ़ फ़लसफ़े हैं। कुछ बस
लफ़्ज़ों में जिंदा रहते हैं, पर हमे महसूस होता है कि
हम उन जीवित-से लफ़्ज़ों को बहुत करीब से जी रहे हैं…।
गौर से देखने पर सिर्फ लफ़्ज़ों का खोल नज़र आता है
भीतर सब खोखला… ना उन लफ़्ज़ों-सा जीना
और ना उन पर हक़ीक़त में यकीन तक करना…!
ये शब्द कि
"वो हर तरफ है
या कि वो कण-कण में है,
या कि वो रोम-रोम में विद्यमान है"
...हम कितनी सहजता से कह देते हैं...।
...और मैं गुनता रहा
इन्हीं शब्दों को बड़ी देर!
-सच! कितने विलक्षण हैं ये शब्द...
कितना अर्थ लिये...!
वस्तुतः यदि इन शब्दों को
अनुभव कर पाएँ ,
तो कितना अलौकिक है ये सत्य-
"तुम हर तरफ, कण-कण में
और रोम-रोम में हो..!",
यदि ये सच ही हमारा अनुभव...
...नहीं
विश्वास ही हो पाये तो,
....कितना विस्मयकारी है ये विश्वास भी!
तो क्या सच में इस बात पर
मैं नहीं करता विश्वास...
कह देता हूँ यूँ ही
बस कहने के लिये....?!
जितना गहन मनन होता है,
विस्मय तीव्र सघन होता है।
तुम मुझमें, मैं तुममें;
तुम सबमें, सब तुम में;
सब मुझमें, मैं सब में;
सब-सब में…,
या सब एक-एक....?!
सब कण जब तुम-ही-तुम व्यापे,
तब अवरोध कहाँ रह जाता;
पग भी तुम, अवरोध भी तुम फिर,
गति का चक्र कहाँ थम जाता!
फिर ये मान लेते हुए, कि कुछ है,
'होने' और 'अनुभव' होने के मध्य,
जो करता है विलग,
तुम्हारे होने और मेरे अनुभव को।
और यही मान मैं पुकार उठता हूँ,
"हे प्रभु! बन जाओ अनुभव मेरा
कि तुम 'हर तरफ', ‘कण-कण’ में और
'रोम-रोम' में हो ....!"
१९०४२८/१९०४२८






निशब्द
Very nice