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रू-ब-रू - अनहद की कलम से

रू-ब-रू

यह भरोसा कर के कश्ती पर चढ़ा था, 
कह रहा माँझी ये सच का ही सफर है;
ये डगर परमात्मा के द्वार तक है,
चढ़ रहा तू इसकी भी उसको खबर है।

ये सफर आनंद का है, प्रेम का है,
इस तरफ बहती तरन्नुम में हवाएँ;
बाग हैं हर ओर फूलों की महक है,
गूँजती उड़ते परिंदों की सदाएँ।

पाँव कश्ती पर रखे कुछ डगमगाए,
फिर संभलकर बैठते, फिर चल पड़े;
गीत गाकर आस के, उम्मीद के हम,
हौसला लंबी डगर का ले बढ़े।

वक़्त थोड़ा कट गया उत्साह में ही,
और थोड़ा रास्ते के मंज़रों में;
और बातें चल पड़ी अपनी पुरानी,
क्या दिखेगा और आगे मंजिलों में!

ज़िंदगी ही नाव थी,
ज़िंदगी ही थी खिवैया;
ज़िंदगी ही धार नद की,
गीत भी वो ही गवैया।
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चलते-चलते अक्स पानी में उभरकर,
कुछ सरकता-सा ज़रा नज़दीक आता;
पर नया चेहरा-सा जैसे गैर कोई,
मेरी नज़रों में उतर खुद को दिखाता।

"कौन हो तुम?" दानवों से दिख रहे,
किस तरह काया भयानक पा गए;
तुम नदी के दैत्य या पाताल से,
किस तरह जलधार पर तुम आ गए?"

"तुम को सम्मुख देखकर भयभीत हूँ मैं,
भय से इस कश्ती से ही गिर जाऊँगा;
तुम अचानक ही कहाँ से आ गए हो,
छोड़ दो, फिर इस जगह ना आऊँगा।"

"अरे माँझी! तुम कहो ये कौन दानव,
भूलवश क्या इसके डेरे आ गए हम?
या कि तुमको था पता इसका ठिकाना,
किस प्रयोजन इसके फेरे आ गए हम?"

ज़िंदगी ही अक्स थी,
ज़िंदगी ही थी नज़ारा,
ज़िंदगी ही रूप धरती,
आँख भी, वो ही इशारा।
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"देख लो कुछ देर इसको भर नज़र से,
क्या ये पहचाना कहीं तुमको लगे है?
क्या कभी देखा है पहले, याद कर लो,
क्या कोई अपना-सा तुमको ये लगे हैं?

"भंगिमा इस की नज़र भर गौर से तुम,
देख लो कुछ भाव पहचाना लगा है?
नैन-नक्शों की बनावट देख कर क्या?
ये नहीं लगता कोई अपना मिला है?"

"अरे माँझी! क्या अनर्गल कह रहे तुम?
ये दिशा तो पूर्व हम आए नहीं हैं;
और कोई मित्र, ना संबंधी कोई,
ना बुजुर्गों ने कभी बतलाए ही हैं।

फिर भी जो तुम कह रहे, हम सोचते हैं,
कौन परिचित ये हमारा, भूलते हैं।
या तो कोई शत्रु ही यूँ भेष धरकर,
आ गया एकांत जब हम घूमते हैं।"

ज़िंदगी ही भूलना थी,
ज़िंदगी ही याद आना;
ज़िंदगी ही ओढ़ती थी,
दोस्त या दुश्मन का जामा।
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कौन है किंचित ना ये पहचान पाता,
देखता नज़दीक जा नज़रे गढ़ा कर;
'हाँ! कभी पहले इसे देखा हुआ है,
पास पहुँचा और कदमों को बढ़ाकर।

'हे प्रभु! ये तो मेरा ही अक्स दिखता,
था बड़ा विस्मित ना ही विश्वास होता;
पर नकारूँ तथ्य जो दिखता मुझे था,
स्वप्न का ही अंश, प्रभु ये काश होता!

किंतु ना ये स्वप्न, ना आभास ही था,
हाँ, मेरा साया ही मेरे रू-ब-रू था!
मैं अचंभित देखकर उस रूप को,
अचकचाया-सा खड़ा मजबूर-सा था।

आँख में आँसू, हृदय में शूल चुभते,
“रूप मुझको ये मेरा क्या दिख रहा है!
इतने बरसों आदमी की देह भीतर,
बीज-दानव, वृक्ष बन पल बढ़ रहा है!"

ज़िंदगी ही बीज थी,
ज़िंदगी ही गर्भ-माटी;
ज़िंदगी पानी, हवा और
बीज-सी ही वृक्ष-काठी।
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"अज्ञान, भय और वासनाओं से भ्रमित हो,
तुमने पोषित इनको जन्मों से किया है;
तोड़ भ्रम को, सत्य की कश्ती में आकर,
आज तुमने इनको विचलित कर दिया है।"

" किंतु" माँझी ने कहा, "अफ़सोस ना कर,
दरिया तुझको अक्स जो दिखला रही है,
हौसला रख देख ले प्रतिबिंब सारे,
धार से अपनी मिटाती जा रही है।"

था कभी डरता, कभी उनको डराता,
देखकर उनको कभी बेहद लजाता;
किंतु माँझी के संदेशों को समझकर,
साक्षी और निरपेक्ष हो मैं देख पाता।

कितने ही ऐसे अनेकों रूप अब तक,
देख कर ये सत्य ज़ाहिर हो चुका है।
साये मेरे हैं, मगर साया नहीं मैं,
झूठ का अस्तित्व सारा खो चुका है।

ज़िंदगी ही सत्य है,
ज़िंदगी ही है छलाव,
ज़िंदगी ही है दिखाती,
सत्य का विस्तृत बहाव।
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जो भरोसा करके कश्ती पर चढ़ा था,
है खुदा को, “चढ़ रहा मैं" ये खबर भी।
ये सफ़र है 'सच' का, माँझी ने कहा था,
सब वही-
“माँझी”, “खुदा”, “मैं”, “ये सफर" भी।

१९१२१५/१९१२२६