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एक अजन्मे को पत्र
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सफ़र तक़मील करने दो - अनहद की कलम से

सफ़र तक़मील करने दो

तुम्हारे इश्क मे पड़ कर,
तुम्हारे घर को आए थे,
तुम्हें हमराह जो जाना--
सफ़र तक़मील करने दो।

ये फ़ितरत है-- जो इस दिल से,
खता हमसे कराती है,
इसी फ़ितरत को अपने इश्क में,
अब तो पिघलने दो।

भूल हमसे हुई माज़ी में,
माफी माँग ली हमने...
हमे बस एक मौका दे के,
वो भूलें भी बदलने दो।

जो अबकी बार हमने,
इस नज़र से, हुस्न को देखा--
वो तेरा हुस्न ही मेरी नज़र,
चढ़ कर सँवरने दो।

तुझे मैं प्यार करता था,
तुझे मैं प्यार करता हूँ--
मुझे इस इश्क कि सारी हदें
तुम पार करने दो।

२५०२२५/२५०२२५