कुछ समझ ना पाऊँ प्रभु
कहाँ, क्या करता हूँ….
क्यूं सोता, क्यूं जगता
प्रभु, क्यूँ जीता हूँ?!
क्या, मेरा ये करना, ना करना,
मुझे तुम्हारे निकट ला रहा है प्रभु?!
अवश्य ही ला रहा होगा,
किंतु आँखों के कोर में,
संदेह के प्रश्न भी विश्राम कर जाते हैं!
तुम कहते हो धैर्य, अनंत धैर्य....!
और मैं बार-बार अधीर हो उठता हूँ,
फिर डर जाता हूँ कि
मेरी ये अधीरता ही, न कही
मुझे तुमसे दूर कर दे!
प्रभु! ये कैसा मार्ग है
जिस के क्षण भर आगे भी
कुछ दीख नहीं पड़ता।
वस्तुतः मार्ग मार्ग-सा ही
नहीं जान पड़ता।
ना कोई गली, ना पगडंडी,
दीख पड़ती है राह बताने,
और अचानक उग आता है,
कभी कोई दोराहा,
या कभी किसी चौरस्ते की ओर जैसे
खुद ही मोड़ देता हूँ,
अपने चलने की दिशा
ना जानते हुए कोई कारण मुड़ने का!
फिर अचकचाता,
उन दोराहों, उन चौरस्तों पर,
अगली दिशा के अनिर्णय से घिरा
बढ़ा देता हूँ
किसी ओर भी अपने कदम,
एक अनंत, अदृश्य मार्ग पर;
या कि खड़ा रह जाता हूँ
उसी दोराहे या चौरस्ते पर
देखने, उनके लुप्त हो जाने को,
या बदलने को उनकी
जमावट!
१८१००३/१८१००३





