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स्मृति से मिट गई थी… - अनहद की कलम से

स्मृति से मिट गई थी…

दोस्ती और प्यार कभी खत्म नहीं होता…!
छिप सकता है कुछ देर को,
वक्त की घनी, गहरी धुंध में…!
और छटते ही उस धुंध के,
फिर खिल उठता है अपनी उसी
मासूम किलक के साथ…!

मिट गई सूरत-सलोनी, 
मैं कहा करता था जिसको,
मिट गई वो चाल मृग-सी,
मैं तका करता था जिसको।
मिट गई वो खनखनाती,
घुली मिश्री में, हंसी वो-
मिट गई वो धुंधली होकर,
स्मृति से मिट गई थी।

तू गई, मैंने सँजोए,
मन-पटल पर दृष्य तेरे,
पत्तियों पर चित्र तेरे,
गढ़ रहे थे नयन मेरे।
वृक्ष के कुछ शून्य से,
झाँका करे तेरी छवि वो-
मिट गई हिलती लता से,
स्मृति से मिट गई थी।

टाँक दी यादें कई
तारों के संग, आकाश ही में,
बात उनसे सब पुरानी
कर रहा हर रात को मैं।
इक अचानक बादलों का
झुंड आकर ले उड़ा-
मिट गई वो नीर बनकर,
स्मृति से मिट गई थी।

याद के कुछ एक टुकड़े
ताल में तैरा दिए थे,
मछलियों के संग, मछली
की तरह तैरा किए थे।
पी गईं सूरज की किरणें,
नीर की हर बूंद को-
मिट गई पानी बिना वो,
स्मृति से मिट गई थी।

आज कैसे याद आईं,
जो कभी तुम मिट गई थीं;
किस तरह छाईं पटल पर,
जो कभी तुम मिट गई थीं;
जन्म फिर कैसे हुआ,
जो आत्मा निष्प्राण-सी थी-
'मिट गई’, हाँ था छलावा,
आज समझा ‘छिप गई थीं‘।

छिप गई होंगी यूँ भय से,
वृक्ष पर वायु भंवर से,
मेघ की काली घटा से
और उनकी गर्जना से,
सूर्य कि किरणों से डरकर,
जा छिपीं धरती के भीतर-
छिप गईं तुम 'मिट गईं-सी'
स्मृति से छिप गई थीं।

आज फिर झाँके सलोना,
आज अम्बर से बुलाए,
ताल के निश्चल सतल पर,
आज वो चुपके से आए,
अक्षरों से शब्द और,
शब्दों की माला बन पड़ी है-
कल तलक जो छिप गई थी,
आज कविता लिख गई है।

९१११०२/९१११०२