संध्या के काले झुरमुट में,
रात उतर जब आ जाती है,
दिवस उदासा, बड़ा अभागा-
आँख अश्रु से भर जाती है।
ये अश्रु ही सब तारे हैं।
बादल इन मासूम अश्रु के
बहने पर जब रोक लगाते,
इन मेघों को चीर-चीर कर,
आँसू तब सब नीचे आते।
ये आँसू हैं रात की बारिश।
संध्या के काले झुरमुट में,
रात उतर जब आ जाती है,
दिवस रश्मियाँ तब अंबर को,
अपने रक्षक दे जाती हैं।
ये रक्षक ही सब तारे है।
रात के बादल इन रक्षक से,
लड़ने को आगे आते हैं,
रक्षक तब अपने अस्त्रों से,
मेघों को पिघला जाते हैं।
मेघ पिघलना, रात की बारिश।
संध्या के काले झुरमुट में,
रात उतर जब आ जाती है,
दिवस खुशी से स्वागत करता,
राह पुष्प से भर जाती है।
ये पुष्प ही सब तारे हैं।
इन पुष्पों की गंध को पाकर,
निशा-मेघ दौड़े आते हैं,
प्रेम देख, पुष्पों, मेघों का,
अंबर-अश्रु छलक जाते हैं।
प्रेम-अश्रु ये रात की बारिश।
९२१२०५/९२१२०५





