एक- तुम बड़ी मीठी हो
तुम बड़ी मीठी हो प्रिये!
सुबह कमल की पंखुड़ी पर पड़ी
ओस की बूँद की तरह।
रात, छत पर अचानक बह चली
हवा की तरह।
और संध्या की
तुलसी की पूजा की तरह।
दो- मेरी साँझ कि टोली
तुम मेरी साँझ की टोली में आना।
तुम पाओगी सतरंगी इंद्रधनुष…
और उनके बीच, मुस्कुराता मैं!
तुम ही हो ये सतरंगी इंद्रधनुष,
और तुम ही हो मेरे होठों पर
तैरती मुस्कुराहट।
तुम्हारे आने से ही इनका अस्तित्व
और जाते ही तुम्हारे
मैं हो जाता हूँ निपट अकेला!
इसी लिए प्रिये,
मेरी साँझ की टोली में
तुम ज़रूर आना।
तीन- ग्रहण की रात
सुबह से दूढ़ता हूँ चाँद-
वो नज़र नहीं आता,
रात अमावस है या
उसकी कोई खबर नहीं लाता!
आज तो खौफ है दिल में-
लोग कहते हैं,
उसको ढँक लेगा कोई साया-
कुछ रहम नहीं आता?!
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