ठहरी, पर अशांत,
क्रांत-क्रांत... !
समय का पल-पल आँख से गुज़रता…
मन को धकियाता-सा
कुरेदता और उग्र करता...
पर बेबस मैं...
कौन मैं?!
मन नहीं।
आत्मा नहीं।
देह नहीं।
फिर कौन?!
कौन आभास पाता है,
मन की उग्रता का?
कौन ग्राह्य करता है,
मन की बेबसी?
मन महसूसता है या
करता है आरोपित...
- किस पर?
तुम आ जाओ, प्रभु!
प्रभा बन, तुम आ जाओ प्रभु...!
इसके पूर्व कि विक्षिप्त मैं हो जाऊँ...!
कहीं तुम देर ना कर दो प्रभु,
भय है...
कहीं तुम देर ना कर दो प्रभु...!
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