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एक अजन्मे को पत्र
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तुम और मैं! - अनहद की कलम से

तुम और मैं!

एक

नंगे पाँव रेत पर समंदर की,
हम साथ चले हाथों में हाथ लिए!
कभी दौड़ कर लहरों से खेलें,
कभी साथ-साथ गुनगुना ही लिए-
"कभी-कभी मेरे दिल में
खयाल आता है...!”

दो

चतुर्थी की रात और 
नर्मदा का किनारा,
तुम और मैं, सिर्फ हम दो !
तुम्हारी आँखों में प्यार की नमी:
और होंठ बेसब्र अधखुले !
तुम्हारी जुल्फे मेंरे गालों को छूतीं-सी,
...और तुम्हारा दिल-
मुझसे अलग कहाँ!

०९०४२८/०९०४२८