पल नहीं, क्षण भर नहीं,
कुछ देर किंचित भी नहीं
-तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं।
हम विपश्यना कर रहे,
तुम साँस के पथ पर सरकती आ गईं।
साँस फिर बाहर औ’ भीतर
किंतु तुम भीतर औ’ भीतर!
साँस की लय याद रह पाती नहीं,
तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं।
देखते मन को सजग, तुम
आँख से भीतर की बचकर आ गईं।
फिर विचारों में कहाँ कुछ!
प्यार के अनगिनत अंकुर-
मन विचारों की झलक आती नहीं,
तुम हमारे ध्यान से जाती नहीं।
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