एक करिश्मा हो तुम!
तुम हो एक नदी,
जो बहती है,
जीवन के एक छोर से दूसरे छोर तक-
बहने के लिए!
बहती है,
तमाम ऊबड़-खाबड़ रास्तों से बेखबर,
और पा लेती है अपना समुंदर...
-हवा के बेदर्द धपेड़ों के बावजूद!
तुम एक वृक्ष हो,
जो झूमता है पक्षियों के कलरव से
और पाता है सुकून,
शाख पर बने घोसलों से!
खिल उठता है देख,
घोसलों में आकार लेते नए जीवन को,
और फल जाता है उनसे आती
नए जीवन की किलकारी के साथ!
तुम वही वृक्ष हो।
तुम हो नदी की कल-कल ध्वनि;
और पेड़ों पर टकराती
हवा की वो सरसराहट;
तुम हो घोंसले से झाँकती,
नवजीवन की पहली चहचहाहट;
और तुम ही हो पूनम के चाँद से आती
वो खामोश आवाज़।
तुम जीवन हो और
ध्वनि भी उस जीवन की!
तुम शिव हो और ओंकार भी !!
... तुम नारी हो।
०९०२१८/०९०२१८





