जब भी मेरे मन के भीतर
शब्द बने, अक्षर थिरके-
तुम याद आए।
कविता कोई रचते-रचते,
भावों को कागज पर धरते-
तुम याद आए।
जब भी कविता ने
दूरी की पूरी अपनी,
और स्वयं को प्रस्तुत करने की
इक चाह जगी-
तुम मानो ना, ये सत्य मगर,
वो कविता सबसे पहले
पास तुम्हारे ही आई।
मेरे मन के अदृश्य दृश्य में
छवि तेरी-
सुनती,गुनती, कुछ
बतलाती आई।
जब भी उस कविता में,
कुछ छाँटा-जोड़ा-
तुम याद आए।
जब भी मेरे मन के अंदर,
शब्द बने, अक्षर थिरके-
तुम याद आए।
१९१०२०/१९१०२०





