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एक अजन्मे को पत्र
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तुमको किनारा कर गई - अनहद की कलम से

तुमको किनारा कर गई

तुमको किनारा कर गई...!

ये लहकती, थे मचलती,
'सरित-सी कल-कलकलाती',
तुम तटस्थत् देखते,
तुमको किनारा कर गई!

तुम व्योम को ताका करे,
के नापते गहराई अपनी,
सरित का पर जल तो सूखे!
"व्योम कुछ बरसों ही रहने दो,
न बरसो,
कुछ तो देखें, हैं कहाँ अब जड़ें मेरी!”
पर नहीं अंबर तनिक तुम पर पिघलते,
वो बरसते तुम पे औ’ इस
'सरित-सी कल-कलकलाती'
पर भी गिरते!
तुम तटस्थत् देखते उसको कि जो
तुमको किनारा कर गई!

देखते तुम-
किस तरह, बिन सोच इसका
लक्ष्य क्या है,
दौड़ती 'कल-कलकलाती’,
'क्या है उद्‌गम, जानती ना,
भूल कर उसको भी, केवल
दौड़ती 'कल-कलकलाती’।
तुम भी कहते,
“अंध है वो दौड़ जिसमें
अंत-उद्‌गम सोच ना हो;
ज्ञात ना हो अर्थ अनुशासन का जिसमें
-व्यर्थ है वो!”
और भी कितना ही तुमने,
सोच, कह डाला उन्हे, पर
तुम तटस्थत् देखते ही
रह गए हो अब उन्हे
औ' ‘सरित-सी कल-कलकलाती',
तुमको किनारा कर गई!

तुम भी केवल सोच, कहकर ही रहे,
कुछ कर न पाए।
स्वयं भी तुम दो किनारों की तरह,
दो स्व में जीते से रहे-
ना दो किनारे मिल सके,
ना 'सरित-सी कल-कलकलाती'
रुक सकी।
मुड़ते ज़रा
- कुछ इस तरफ से, उस तरफ से,
तनिक मिलते,
रोककर कुछ बात करते,
स्वयं से और
'सरित-सी कल-कलकलाती'
को भी उसकी जड़ बताते,
गर्व अपना हाय! पर तुम छोड़ पाते।

तनिक अपने को झुकाते,
हृदय से, बाँहे मिला, उसको लगाते,
प्यार से सब कुछ बताते,
स्वयं को पर हाय! कुछ तो बदल पाते।
पर नहीं बदले, ना अपना गर्व छोड़ा,
ना कभी चाहा समझना,
‘सरित-सी कल-कलकनाती'
का लहकना।
अब तो अपने अनुभवों का रौंदना ही देखना है,
देखते हो तुम तटस्थत्,
तुमको किनारा कर गई!

किंतु हे अनुभवीजनो!
धार अनुभव की तनिक पैनी करो,
ये तटस्थत् देखना भाता नहीं।
'सरित-सी कल-कलकलाती'
का लहकना, का मचलना,
अनुभवों की डोर में उनको पिरोना,
हाय! तब हम सब बढ़ेंगें,
वृक्ष से ही एक सम हो,
और तब ही देख पाओगे,
खुशी-आशा नज़र से,
'सरित-सी कल-कलकलाती' का
सुरों में बंध लहकना!
ना रहोगे तुम तटस्थत्,
ना 'सरित-सी कल कलाती’,
तुमको किनारा कर सकेगी।

९२०७२२/९२०७२३