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उम्मीद का दामन - अनहद की कलम से

उम्मीद का दामन

शुक्र है कि, शुक्रिया का
ये अदब बाकी अभी,
वरना, मदहोशी में गुम ये,
नस्ल क्यों सजदा करे!

फिर भी कुछ ईमान ज़िंदा
बच रहा बाज़ार में,
मेरी जेबों में रखे सिक्के
गवाही दे रहे!

उन ने लूटा हर शहर--
कस्बे मगर कुछ बच गए,
कुछ तो ज़िंदा लोग,
जमाअत में लुटेरों की रहे!

तुम बुराई करके थकते
ही नहीं, पर दोस्त मैं,
छोड़ता उम्मीद का
दामन नहीं-- इस वक़्त से!

और पीठों को नुकीले
खंजरों से छेद दो,
कटघरे में मैं अँधेरों को
ही रखूँगा ‘गितेन’!

२५०४०१/२५०४०१