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विरह के आँसू - अनहद की कलम से

विरह के आँसू

मैंने बनाई है अपने 
आँसुओं से इक माला-
उन आँसूओं से जो निकले थे
तुम्हारे विरह में।
तुम आओ तो पहना दूँ उसे
तुम्हारे गले में।
तुम उसे उतारना मत,
छूने देना उसके भीगेपन को
अपने दिल से।
वो पहचान लेगा,
उन आँसुओं में छिपा दर्द!

०९०६१७/०९०६१७