सुमिरन को फैला दो,
जीवन के हर क्षण में।
रोम-रोम में अपना ही
विस्तार करो प्रभु!
बस तेरा ही नाम जपूँ,
बस तेरा ही ध्यान करूँ;
बस तेरे ही भावों में तैरूँ
मैं प्रतिपल,
प्रभु! तेरे ही स्पर्शों का
स्नान करूँ।
हे प्रभु! अपने आलिंगन में
भर ले तू!
हे प्रभु! बस ये बंधन ही
अब स्वतंत्र लगे!
१८०९१३/१८०९१३





