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एक अजन्मे को पत्र
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ये कैसे तुम हो सकती हो! - अनहद की कलम से

ये कैसे तुम हो सकती हो!

नहीं, नहीं उफ्फ़!
ये कैसे तुम हो सकती हो!

इस अतिमद्धिम जीवदीप में,
पुनः नेह से प्राण बसाए,
प्राणों का सैलाब बहा,
उज्ज्वल-अति उज्ज्वल
-तेरा चेहरा भी,
दीपक के उजले प्रकाश में।

अपने कोमल भावों से तुमने,
दबे-दबे मेरे भावों को,
सहलाकर फिर से उकसाया।
भावों के व्यापक सागर में,
तुम भी कितना तैरीं, डूबीं
-फिर बच आईं,
कितना-कितना तुमने यूँ आनंद लिया,
इस भाव-सगर का।

कैसे अब विश्वास करूँ-
उफ्फ़! ये कैसे तुम हो सकती हो!

वो खुले अधर, वह दंत-पंक्ति,
वो ही सब मेरी शक्ति बने थे,
मैं थका हुआ था- हारा था,
टूटा-सा बेबस...
मैं अजब विचारों में- तुम आईं।
वो आँखें ही विश्वास बनी थीं-
वो उठती थीं जब,
उठता था विश्वास मेरा!
तुम उसी भरोसे की चादर को ओढ़
कहाँ तक दौड़ चली थीं।

मैं चकित बड़ा भीगे नयनो से-
उफ्फ़! ये कैसे तुम हो सकती हो!

व्यथा, शोक सब
विगत दिनों की बात हो चली थी
-जब तुम थीं,
तुम थीं तब तक, निश्चिंत रहा
-'तुम हो'।
'तुम हो'- की वह प्रथम मिलन-की-सी
अनुभूति सदा रही थी,
'तुम हो'- लगती थी बालक-मुख से
प्रथम ध्वनि-सी,
'तुम हो' 'तुम हो', 'तुम हो' का ही स्वर
धड़कन बन गूँज रहा था
सर्वहृदय में।

'तुम हो' की इस एक ध्वनि से
कितने अनुनाद किए तुमने!
इन अनुनादों को
बार-बार ही सुनने को मैं
व्याकुल था- कितना कितना;
तुम भी- बार-बार
'तुम हो' कहतीं थीं।

वो कंपन ही जब श्रव्य नहीं तब
-ये कैसे तुम हो सकती हो!

तुम थीं,
दीपक पर नेह- भाव का मेह,
तुम खुले अधर थीं, दंत-पंक्ति थीं,
उठी आँख में मेरा वो
विश्वास ही तुम थीं,
तुम थीं- 'तुम हो' अनुनाद!

कहो! कहाँ तुममें दिखता है
'तुम'-सा कुछ भी!
विश्वास-हीन, ना नेह, भाव से मेहहीन,
सिकुड़े अधरों की शक्तिहीन!

धड़कन में किंचित
जीवन का कुछ नाम नहीं-
ना..., ये कैसे तुम हो सकती हो!

९२०८२९/९२०८२९