संध्या समय
थमी हवा में होता है एक सन्नाटा…
होती है उस सन्नाटे की भी
एक आवाज़...!
किंतु अभी तो
वो आवाज़ भी सुनाई नहीं देती...!
ना शोर है,
ना हैं मौन के
शांत स्वर ही,
ना गति, ना स्थिरता का
पदचिह्न कोई।
ना बीते, ना आते कल की
कोई ध्वनि;
ना वर्तमान की भी कोई...
ठीक पाँवों के नीचे,
पड़ती छाया...!
ना धूप,
ना छाँव की श्यामल फुहार;
ना आँसू, ना उनके
सूख जाने की रिक्तता;
होंठों के गिर्द,
ना गिरती, ना उठती
भावों की व्यक्त रेखाएँ...!
बस जहाँ हूँ, वहाँ हूँ,
ना होते हुए भी...!
ये क्या है प्रभु !
जो छाता भी नहीं और
छोड़ जाता भी नहीं...!
जो जाता भी नहीं और
जान पाता भी नहीं...!
कुछ ठहरा हुआ-सा बस...!!
२६०४१९





