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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

हिय तुमने जब मेरा छीना

हिय तुमने जब मेरा छीना।पहले-पहल तब,आँख खोलकर, ज़रा ठहर कर,दाएँ-बाएँ सिर को घुमाकर… आँख नचाकर,समझ रहा मैं…बदल गया रे मेंरा जीना,हिय तुमने जब मेरा छीना।फिरिक चमक मेंरी अँखियों ने देखी।देखी, …

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हर तरफ बस तुम ही हो!

‘हर तरफ बस तुम ही हो’-मैं इस भाव को घनीभूत करता हूँ।मैं मानता हूँ अपने आप कोघिरा हुआ, तुमसे ही- सब ओर,और अपने भीतर भीइस तुम्हारे ही होने के भाव …

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ये क्या है, प्रभु?

संध्या समय थमी हवा में होता है एक सन्नाटा…होती है उस सन्नाटे की भी एक आवाज़…!किंतु अभी तोवो आवाज़ भी सुनाई नहीं देती…!ना शोर है,ना हैं मौन केशांत स्वर ही,ना …

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मोहजाल

कौन कहता हैकि तुम्हे अंधेरे में दिखाई नहीं देता?क्या जन्मों-जन्मइन अंधेरी कोठरियों में घूमते,तुम इन अनंत वासनाओं कोअपने विस्फारित नेत्रों से नहीं देख रहे?और क्या नहीं मोहित हो रहेआभासी प्रकाश …

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