दर्द
दर्द गहराई देता है।पर उस दर्द की सतह पर ना रुक जाओ।उतरो उस दर्द की गहराई में;गहरे… और गहरे, तब पाओगे,सिर्फ गहराई है,दर्द तो नदारद है! १८१००८/१८१००८
दर्द गहराई देता है।पर उस दर्द की सतह पर ना रुक जाओ।उतरो उस दर्द की गहराई में;गहरे… और गहरे, तब पाओगे,सिर्फ गहराई है,दर्द तो नदारद है! १८१००८/१८१००८
एक- पुकार तुम कहाँ हो प्रभु! क्या मेरी पुकार इतनी मंद हैकि उसकी ध्वनि तुम्हारे कानों तक पहुँचती नहीं?क्या तुम इतने दूर हो प्रभु,कि तुम्हारी विराट दृष्टि भी मुझ पर …
कुछ समझ ना पाऊँ प्रभुकहाँ, क्या करता हूँ….क्यूं सोता, क्यूं जगताप्रभु, क्यूँ जीता हूँ?! क्या, मेरा ये करना, ना करना,मुझे तुम्हारे निकट ला रहा है प्रभु?!अवश्य ही ला रहा होगा,किंतु …