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SUHAS MISHRA - अनहद की कलम से

तुम और मैं!

एक नंगे पाँव रेत पर समंदर की,हम साथ चले हाथों में हाथ लिए!कभी दौड़ कर लहरों से खेलें,कभी साथ-साथ गुनगुना ही लिए-“कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है…!” दो चतुर्थी …

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तुम कहाँ हो?

तुम कहाँ हो?बारिश में भीगी मिट्टी की महकतुम्हारी देहगंध सी क्यों लगती है?क्या तुम कहीं आस-पास ही हो?हवा की इस छुअन में क्यों होता हैतुम्हारे स्पर्श का अहसास?क्यूँ रात के …

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देह-प्रेम

तुम भवन के साथ भँवरे हो जाते हो।ईंट, गारा, रेत, मिट्टी से बना;चमकदार और चटकदार रंगों से लिपटा!तुम अक्स देख कितने मोहित हो!तनिक इधर से, तनिक उधर से-तराशने में कितने …

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मैं कहाँ और ये कहाँ

प्रेम के गणित में उलझे हुए तुम, फायदे की बात ही करते रहे।फूल प्लास्टिक के लगाए फिर रहे हो, चीखते हो खुशबूएँ गुम हो गई हैं।तुमने बस अक्सों में ही …

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