प्रेम-रसधार
कल चंदा को देखा तुमने?सूट पहन कर, इक तारे को रिझा रहा था!बादल के टुकड़े को देखा?दूर बैठ कर इक मयूर को नचा रहा था!चमको-चमको प्रेम में चंदा बन कर …
कल चंदा को देखा तुमने?सूट पहन कर, इक तारे को रिझा रहा था!बादल के टुकड़े को देखा?दूर बैठ कर इक मयूर को नचा रहा था!चमको-चमको प्रेम में चंदा बन कर …
देह में चुभते-चुभते,तुम्हारी आँखो को भी चुभने लगे हैं।काँटों का भी उद्देष्य होता है कोई…या निपट निर-उद्देष्य भी हो सकते हैं……सिर्फ होने के लिए… !! ०९०३२४/०९०३२४
शब्दों के प्रपंच और तर्को की निरर्थकता-उम्र लगती है समझने को!प्यार अनुभव है व्याकरण नहीं- जिसके बँधे नियम हो।विस्तृत आकाश में बिखरे तारों की चमक-तुम उन्हे गौर कर सकोगीप्यारे पूनम …
अपनी पलकों को तनिक मिला लो-सोचो कि इक पलक तुमऔर इक मैं हूँ!तब तुम्हारी नम होतीआँखो की तरलता,हम दोनों के बीच बहता प्यार है…!उसे बन जाने दो आँसू और बहने …